बिहार में शराबबंदी लागू होने के साल भर बाद ही इस ख़बर ने कई लोगों को चौंकाया था.
अब चौंकाने वाली दूसरी ख़बर ये है कि शराबबंदी क़ानून के तहत बिहार में अब तक एक लाख से भी ज़्यादा मामले दर्ज हुए हैं.
इतना ही नहीं डेढ़ लाख से भी ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.
ये आंकड़े ख़ुद बिहार पुलिस के महानिदेशक गुप्तेश्वर पांडेय ने बीबीसी को उपलब्ध कराया है.
हाल में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने बछवाड़ा की रैली में कहा, "चचा (नीतीश कुमार) ने बिहार में शराबबंदी की. लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ. लोग अभी भी जम कर शराब पी रहे हैं."
"200 रुपया का बोतल 1500 में मिल रहा है कि नहीं मिल रहा है? तो ये 1500 और 200 के बीच का जो अंतर 1300 रुपया है, वो किसके पॉकेट में जा रहा है?"
विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता होने के नाते ये कहा जा सकता है कि तेजस्वी का ये बयान शराबबंदी क़ानून को लेकर विपक्ष का स्टैंड भी है.
लेकिन जिस तरह से तेजस्वी शराबबंदी क़ानून की असफलता को जनता के सामने रख रहे हैं, उसे लेकर सरकार ने भी अपना पक्ष स्पष्ट किया है.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ऐसे सवालों पर बार अपना पक्ष ये कहकर देते रहे हैं कि "वे बिहार को शराबमुक्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं."
"शराबबंदी का काफ़ी सकारात्मक असर रहा है. यदि शराबंबदी के व्यापक असर का विश्लेषण किया जाए तो ये बात फीकी पड़ जाएगी कि ये क़ानून थोपा गया है."
लेकिन शराबबंदी को लेकर पेश की जा रही इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है. बिहार में पूर्ण शराबबंदी को लागू हुए अब तीन साल बीत चुके हैं.
और इन तीन सालों के दौरान शायद ही कोई ऐसा दिन बीता हो जिस दिन बिहार के अख़बारों में शराबबंदी क़ानून तोड़ने की ख़बर न छपी हो.
डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे ने बीबीसी को बताया कि बिहार में शराबबंदी क़ानून के तहत अब तक कुल 116,670 मामले दर्ज हुए हैं और इस सिलसिले में 161,415 लोगों को गिरफ़्तार किया गया. इनमें से 13214 लोगों पर शराब का अवैध व्यापार कर रहे गिरोहों से जुड़े होने का आरोप है.
डीजीपी के मुताबिक़ शराबबंदी के इन तीन सालों की अवधि में कुल 50,63,175 लीटर शराब बरामद की जा चुकी है.
यदि शराबबंदी को मिनट दर मिनट आंका जाए तो आंकड़े गवाही देते हैं कि, "एक अप्रैल 2016 को बिहार में शराबबंदी क़ानून लागू होने के बाद से लेकर 31 मार्च, 2019 तक हर एक मिनट में कम से कम तीन लीटर शराब की बरामदगी हुई और 10 मिनट के अंदर एक गिरफ्तारी की गई."
हालात की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि शराबबंदी क़ानून को लागू करने में लापरवाही के आरोप में, उसे तोड़ने और अवैध शराब के व्यापार को संरक्षण देने के आरोप में अभी तक कुल 430 पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की जा चुकी है.
गुप्तेश्वर पांडे से मिले निर्देशों के बाद पुलिस मुख्यालय में हमें आंकड़े और कार्रवाई के बारे में बताते हुए डीएसपी अभय नारायण सिंह इस बात को ज़ोर देकर कहते हैं कि "जिन पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई की गई है, उनमें से 56 पुलिसकर्मियों पर आरोप इतने गंभीर हैं कि वे नौकरी से बर्खास्त किए जा चुके हैं. जिन 213 के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई है, उनमें 26 सब इंस्पेक्टरों के ख़िलाफ़ इस तरह की कार्रवाई हुई है कि अगले 10 साल तक वे थानाध्यक्ष नहीं बन पाएंगे."
ज़ाहिर है कि सब कुछ ठीक नहीं है तो ऐसे में ये सवाल उठता है कि आख़िर चूक कहां हो रही है?
बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद शराबबंदी क़ानून की नाकामी को आर्थिक नज़रिए से देखते हैं.
वे कहते हैं, "इसमें पैसे का रोल सबसे अधिक है. शराबबंदी करके सरकार ने कुछ लोगों को बहुत अमीर बना दिया है. लेकिन दिक़्क़त है कि वो पैसा कहीं काग़ज़ पर नहीं है. हालांकि, ये ज़रूर है कि पुलिसकर्मियों को क़ानून के उल्लंघन में और लापरवाही में पकड़ा गया है, मगर वो बहुत छोटे लोग हैं, बहुत कम हैं. असली लोग ना तो पकड़े जा रहे हैं, ना ही उनपर बात की जा रही है. क्योंकि वे बड़े लोग हैं, सरकार से मिले हुए लोग हैं."
इस सवाल पर पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज के प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर कहते हैं, "क़ानून तो क़ानून ही होता है. थोपने और नहीं थोपने की कोई बात ही नहीं है. लेकिन ये ज़रूर है कि इस क़ानून को ग़लत तरीक़े से इंप्लीमेंट किया गया. जितनी भी गिरफ्तारियां हुई हैं उनमें से अधिकांश शराब के कूरियर्स गिरफ्तार हुए हैं, सप्लायर्स के ऊपर कार्रवाई नहीं हो रही है. इसको चूक कहिए या प्लानिंग मगर इतने अधिक लोगों पर मुक़दमे होना और गिरफ्तारी दर्शाता है कि शराबबंदी क़ानून फेल हो गया है."
लेकिन पटना हाई कोर्ट के सीनियर एडवोकेट संदीप शाही प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर की राय से सहमत नहीं हैं.
संदीप शाही की राय में, "शराबबंदी सामाजिक सुधार के वास्ते किया गया था. अभी भी इसका मूल मक़सद यही है. वैसे तो गिरफ्तारी और मुक़दमों के आंकड़ें इस पर ज़रूर सवाल खड़े करते हैं, लेकिन सकारात्मक असर भी पड़ा है. थानों में दर्ज सड़क दुर्घटना के मामले घटे हैं. परिवारों में ख़ुशियां लौटी हैं. लेकिन ये भी सच है कि इस क़ानून का उल्लंघन हो रहा है. केवल क़ानून बनाकर शराबबंदी नहीं की जा सकती. क्योंकि ये समाज की इच्छा और अनिच्छा से जुड़ा मसला है."
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